अध्याय : अंतवाड़ा की स्थापना - त्याग, मर्यादा और भाईचारे की कथा
इतिहास केवल तारीखों और युद्धों से नहीं बनता, बल्कि वह उन शांत निर्णयों से भी गढ़ा जाता है, जिनमें त्याग, समझ और मर्यादा समाहित होती है। अंतवाड़ा की स्थापना की कथा भी ऐसी ही एक शांत, लेकिन अत्यंत गहरी लोक-ऐतिहासिक घटना है, जिसे गांव की पीढ़ियां आज तक सहेजती आई हैं।
लगभग ग्यारहवीं शताब्दी का वह समय था, जब गुजरात क्षेत्र लगातार अस्थिरता, आक्रमणों और भुखमरी से जूझ रहा था। जीवन असुरक्षित हो चला था। ऐसे कठिन समय में गुर्जर प्रतिहार वंश के दो सगे भाई - टीकेराम (बड़े भाई) और अंतराम (छोटे भाई) - अपने परिवारों के साथ सुरक्षित भविष्य की तलाश में निकल पड़े।
उनके पास कोई विशाल काफिला नहीं था, न ही संपत्ति का ढेर। कुछ घरेलू सामान, पशु, और जीवनभर की स्मृतियां - सब कुछ बैलगाड़ियों पर लदा था। वे जहां जाते, वहीं कुछ समय ठहरते, और आगे बढ़ जाते।
यात्रा के दौरान एक परंपरा स्वतः बनी हुई थी - जहां छोटा भाई ठहरेगा, वहां बड़ा भाई भी साथ ठहरेगा।
इसी क्रम में वे उस स्थान पर पहुंचे, जहां आज अंतवाड़ा गांव स्थित है। यह स्थान उपजाऊ था, जल के साधन थे और जीवन बसाने के योग्य प्रतीत होता था। दोनों भाई कुछ समय के लिए यहां रुके। यहीं से इतिहास ने एक नया मोड़ लिया।
छोटे भाई अंतराम की पत्नी ने अत्यंत संकोच और मर्यादा के साथ अपने पति से एक बात कही। यह कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि उस समय की सामाजिक मर्यादा और नारी सम्मान से जुड़ा एक स्वाभाविक भाव था। उसने कहा-
“यहां जेठ जी (टीकेराम) की उपस्थिति के कारण पर्दा करने में कठिनाई होती है।
यदि संभव हो, तो उनसे निवेदन किया जाए कि वे थोड़ा आगे जाकर ठहरें।”
अंतराम के लिए यह बात कहना आसान नहीं था। बड़े भाई के प्रति सम्मान, आज्ञाकारिता और पारिवारिक अनुशासन उस समय जीवन का आधार थे। फिर भी, उन्होंने साहस जुटाकर यह बात बड़े भाई टीकेराम तक पहुंचाई।
टीकेराम ने इस निवेदन को न तो अपमान समझा, न ही इसे विवाद का विषय बनाया। उन्होंने इसे परिवार की मर्यादा और स्त्री सम्मान से जुड़ा प्रश्न माना। बिना किसी तर्क-वितर्क के, बिना किसी कटुता के, उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया, जो आज भी अंतवाड़ा की आत्मा में बसता है।
टीकेराम ने अपनी गाड़ी आगे बढ़ाई।
लगभग चालीस किलोमीटर आगे जाकर उन्होंने वहीं स्थायी रूप से बसने का निर्णय लिया। उसी स्थान पर आगे चलकर टिकोला गांव की स्थापना हुई।
उधर, छोटे भाई अंतराम उसी स्थान पर स्थायी रूप से बस गए, जहां आज अंतवाड़ा गांव स्थित है। समय के साथ यह बसावट मजबूत होती गई, पीढ़ियां बढ़ती गईं, और गांव ने अंतराम के नाम पर ही “अंतवाड़ा” के रूप में अपनी पहचान प्राप्त की।
यह कथा केवल दो गांवों की उत्पत्ति नहीं बताती। यह उस युग की सामाजिक चेतना, पारिवारिक अनुशासन, स्त्री सम्मान और भाईचारे की मिसाल है।
जहां गांव किसी युद्ध से नहीं, बल्कि त्याग और समझ से बसे। जहां सीमाएं तलवार से नहीं, बल्कि मर्यादा से तय हुईं।
अंतवाड़ा की नींव किसी किले की दीवारों से नहीं, बल्कि एक भाई के त्याग और दूसरे भाई के सम्मान से रखी गई। यही कारण है कि आज भी यह गांव केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है।


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